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जोन-सी(5) में “भुखण्ड संख्या -629,सुर्य नगर” अवैध कॉमर्शियल निर्माण पर मेहरबानी, जेडीए के आदेशों को खुली चुनौती

*नोटिस जारी, कार्रवाई गायब!*

जोन-सी(5) में “भुखण्ड संख्या -629,सुर्य नगर” अवैध कॉमर्शियल निर्माण पर मेहरबानी, जेडीए के आदेशों को खुली चुनौती

नोटिस के बाद भी धड़ल्ले से जारी निर्माण कार्य, जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर उठे सवाल

हिंद रफ्तार,जयपुर
जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) के जोन-सी(5) में अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई के दावे लगातार खोखले साबित होते नजर आ रहे हैं।”भुखण्ड संख्या -629,सुर्य नगर” में एक कॉमर्शियल निर्माण को लेकर पूर्व में नोटिस जारी किया गया था, लेकिन हैरानी की बात यह है कि नोटिस जारी होने के बाद भी निर्माण कार्य न केवल जारी है बल्कि तेजी से आगे बढ़ रहा है। इससे जेडीए की प्रवर्तन व्यवस्था और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।

सूत्रों के अनुसार संबंधित भूखंड पर व्यावसायिक निर्माण बिना आवश्यक स्वीकृतियों के संचालित किया जा रहा है। मामले की शिकायतें मिलने के बाद जेडीए ने नोटिस जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी होने का संदेश देने की कोशिश की, लेकिन धरातल पर स्थिति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मौके पर निर्माण कार्य लगातार जारी है और निर्माणकर्ता किसी भी प्रकार की कार्रवाई से बेखौफ दिखाई दे रहे हैं।

क्या नोटिस सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह गए हैं?

शहर में लगातार यह चर्चा है कि जेडीए द्वारा जारी किए जाने वाले नोटिस अब केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह गए हैं। यदि किसी निर्माण को नियमों के विरुद्ध मानते हुए नोटिस जारी किया गया था तो फिर निर्माण कार्य को तत्काल प्रभाव से बंद क्यों नहीं कराया गया? आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि नोटिस के बाद भी निर्माणकर्ता नियमों को खुलेआम चुनौती दे रहे हैं?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई होती तो अवैध निर्माण इस स्तर तक नहीं पहुंचता। लेकिन यहां तो नोटिस के बाद निर्माण कार्य और अधिक गति पकड़ता दिखाई दे रहा है, जिससे यह संदेश जा रहा है कि नियमों की अनदेखी करने वालों को किसी का संरक्षण प्राप्त है।

प्रवर्तन शाखा की भूमिका पर उठ रहे सवाल

जेडीए की प्रवर्तन शाखा की जिम्मेदारी अवैध निर्माणों को रोकने और नियमानुसार कार्रवाई करने की होती है। लेकिन जोन-सी(5) में सामने आए इस मामले ने प्रवर्तन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर नोटिस जारी होने के बाद मौके पर निरीक्षण हुआ या नहीं? यदि हुआ तो निर्माण कार्य कैसे जारी रहा? यदि नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

शहर के जानकारों का मानना है कि अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई के कारण ही निर्माणकर्ता नियमों को गंभीरता से नहीं लेते। कई मामलों में पहले नोटिस जारी किए जाते हैं और बाद में फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।

अवैध निर्माणों से जेडीए को करोड़ों का नुकसान

विशेषज्ञों का कहना है कि बिना स्वीकृति के बनने वाले व्यावसायिक निर्माण न केवल मास्टर प्लान और भवन उपविधियों की धज्जियां उड़ाते हैं बल्कि इससे जेडीए को राजस्व का भी भारी नुकसान होता है। नियमित शुल्क, विकास शुल्क और अन्य देयताओं से बचने के लिए कई निर्माणकर्ता नियमों को ताक पर रखकर निर्माण कर लेते हैं और बाद में नियमितीकरण की राह तलाशते हैं।

आखिर किसके संरक्षण में चल रहा निर्माण?

क्षेत्र में सबसे बड़ा सवाल यही चर्चा का विषय बना हुआ है कि जिस निर्माण पर जेडीए स्वयं नोटिस जारी कर चुका है, उस पर अब तक प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या जिम्मेदार अधिकारी किसी दबाव में हैं या फिर अवैध निर्माणकर्ताओं को विशेष संरक्षण प्राप्त है?

यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो यह मामला जेडीए की कार्यप्रणाली पर एक और बड़ा सवाल बन सकता है। वहीं आमजन यह जानना चाहते हैं कि नियमों का पालन केवल आम नागरिकों के लिए है या फिर प्रभावशाली लोगों के लिए अलग व्यवस्था लागू है।

बड़े सवाल

● नोटिस के बाद भी निर्माण कार्य क्यों नहीं रुका?
● क्या जेडीए के आदेशों की कोई अहमियत नहीं रह गई है?
● क्या प्रवर्तन शाखा ने मौके पर कार्रवाई की या सिर्फ कागजी खानापूर्ति हुई?
● आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह कॉमर्शियल निर्माण?
● क्या उच्च अधिकारी मामले की जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करेंगे?

अब निगाहें जेडीए के उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इस मामले में सख्त कार्रवाई करते हैं या फिर यह नोटिस भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।

Hind Raftar
Author: Hind Raftar

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